सुप्रीम कोर्ट में तलाक़ पर एक और याचिका, तलाक़-ऐ-किनाया, तलाक़-ऐ-बाऍन को असंवैधानिक घोषित करने की मांग

सुप्रीम कोर्ट में तलाक़ पर एक और याचिका, तलाक़-ऐ-किनाया, तलाक़-ऐ-बाऍन को असंवैधानिक घोषित करने की मांग

सुप्रीम कोर्ट में एक मुस्लिम महिला द्वारा जनहित याचिका दायर कर तलाक़-ऐ-किनाया, तलाक़-ऐ-बाऍन और तमाम एक्स्ट्रा जुडिशियल तलाक़ों को शून्य और असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गयी है।

याचिकाकर्ता ने मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम, 1939 की वैधता को चुनौती देते हुए शीर्ष न्यायालय से गुहार की है कि इसे अमान्य और असंवैधानिक घोषित किया जाए क्यूंकि यह मुस्लिम महिलाओं को इस प्रकार कि तलाक़ों से सुरक्षित रखने में विफल रहा है।

याचिकाकर्ता ने अपनी अपील में कहा कि इमाम, मौलवी और काज़ी इन तलाक़ों का प्रचार-प्रसार और समर्थन करते हैं वह अपने पद, प्रभाव और शक्ति का घोर दुरूपयोग कर मुस्लिम महिलाओं को ऐसे व्यवहार के अधीन करते हैं जो उन्हें संपत्ति के रूप में देखता है, और जिसके कारण संविधान के अनुच्छेद 14 , 15 , 21 और 25 में उन्हें प्राप्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि इस प्रकार के तलाक़ न तो लैंगिक समानता और मानव अधिकारों के आधुनिक सिद्धांतों के साथ समंजस्यपूर्ण हैं और न ही इस्लामी आस्था का अभिन्न अंग हैं।

याचिकाकर्ता ने कहा कि इस तरह के तलाक़ महिलाओं और पुरुष के बीच भेद-भाव पैदा करते हैं जो महिलाओं की गरिमा के अधिकार का घोर उल्लंघन है।

याचिकाकर्ता ने दहेज की मांग पूरी न करने पर उसे पति और उसके परिवार द्वारा गंभीर शारीरिक प्रताड़ना का आरोप भी लगाया है।

पेशे से डॉक्टर याचिकाकर्ता ने शीर्ष अदालत को बताया कि शादी के बाद भी उसके पिता ने MS की फीस का भुगतान किया और उसे अपने दूसरे खर्चों के लिए भी अपने पिता पर ही निर्भर रहना पड़ता था।

अपनी शिकायत में याचिकाकर्ता ने शीर्ष अदालत को बताया कि उसके माता-पिता को दहेज देने के लिए मजबूर किया गया, बड़ा दहेज न मिलने पर पहले उसके पति ने उसे उसके माता-पिता के घर पर छोड़ दिया और बाद में एक काज़ी और अधिवक्ता के माध्यम से तलाक़ दे दिया।

क्या है तलाक़-ऐ-किनाया और तलाक़-ऐ-बाऍन?

तलाक़-ऐ-किनाया: इस तरह दी गयी तलाक़ जिसमे पुरुष स्पष्ट रूप से तलाक़ शब्द का प्रयोग नहीं करता बल्कि उसके व्यव्हार तथा शारीरिक भाषा में अर्थ छिपा होता है। ऐसी हालत में पुरुष की वास्तविक मंशा का जानना आवश्यक होता है कि उसने उन शब्दों का प्रयोग तलाक़ के लिए ही किया है। शाब्दिक और लाक्षणिक अर्थ कि व्याख्या पुरुष के माध्यम से जानना आवश्यक है। यदि पति कहता है कि उसकी मंशा शाब्दिक थी तो तलाक़ नहीं होगा लेकिन अगर वह लाक्षणिक रूप से उन शब्दों का प्रयोग करता है तो तलाक़ मानी जाएगी।

तलाक़-ऐ-बाऍन: शब्द “बाऍन” का अर्थ है अलग होना। ऐसी तलाक़ जिसमे पति के लिए ये संभव नहीं होता कि वह पुनः अपनी पूर्व पत्नी से निकाह करे जब तक उस महिला का दूसरा विवाह किसी दूसरे पुरुष के साथ न हो जाए, फिर यदि वह दूसरा पुरुष अपनी पत्नी (पहले पुरुष की पूर्व पत्नी) को तलाक़ दे देता है तो पहला पति अपनी पूर्व पत्नी से पुनः विवाह कर सकता है। इस प्रक्रिया को हलाला कहते हैं।

मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम, 1939 के अंतर्गत क्या हैं तलाक़ के प्रावधान?

इस अधिनियम के अंतर्गत एक महिला की यदि मुस्लिम रीति रिवाज से शादी हुई है तो वह निम्न में से किसी एक या अधिक कारणों से अपने पति से तलाक़ ले सकती है:
1. यदि उसका पति 4 साल की अवधि से लापता है।
2. यदि उसका पति 2 साल की अवधि से उसे भरण पोषण की व्यवस्था में विफल रहा हो या उपेक्षा की हो।
3. यदि उसके पति को 7 साल का कारावास हुआ हो।
4. यदि उसका पति 3 साल की अवधि तक बिना किसी उचित कारणों के अपने वैवाहिक कर्तव्यों के पालन में विफल रहा हो।
5. यदि उसका पति विवाह के समय से अब तक नपुंसक हो।
6. यदि उसका पति 2 साल की अवधि से पागल हो या कुष्ठ रोग या विषाणुजनित योन रोग से पीड़ित हो।
7. यदि उसका विवाह उसके पिता या अभिभावकों द्वारा 15 वर्ष की आयु से पहले कर दिया गया हो और उसने 18 वर्ष की आयु से पहले अपने विवाह को अस्वीकार्य कर दिया हो।

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